चंडीगढ़, 22 मई 2026: 62 साल की भूर कौर पिछले 15-16 सालों से डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन से जूझ रही थीं। यह बीमारी भूर कौर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। दवाएँ, टेस्ट, सावधानियाँ कुछ भी असामान्य नहीं था। लेकिन एक दिन, अचानक उनके शरीर ने काम करना बंद कर दिया। उनका ब्लड शुगर अचानक 550 mg/dL तक पहुँच गया। कुछ ही पलों में वह गिर पड़ीं। वह ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रही थीं।
उनके परिवार के पास सोचने का बिल्कुल समय नहीं था। बस तुरंत कदम उठाने का समय था। उनकी बहू परमजीत ने कहा, “हम बस भाग रहे थे और दुआ कर रहे थे। सोचने का कोई रास्ता नहीं था, बस घबराहट थी।” उनके बेटे हरपाल के लिए वह पल किसी बुरे सपने जैसा था।
कुछ सेकंडों पर टिकी थी ज़िंदगी
जब भूर कौर को संगरूर में कश्मीरी हार्ट केयर सेंटर लाया गया तो उनकी हालत बहुत नाज़ुक थी। क्लिनिकल कार्डियोलॉजिस्ट और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. अंशुमन फूल को वह स्थिति आज भी साफ़-साफ़ याद है, “भूर कौर को डायबिटिक कीटोएसिडोसिस, गंभीर इन्फेक्शन और सांस लेने में गंभीर तकलीफ़ (acute respiratory failure) के साथ बहुत नाज़ुक हालत में अस्पताल लाया गया था। उनका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा था, उनके दिल की हालत स्थिर नहीं थी और उनका शरीर एक खतरनाक मेटाबॉलिक असंतुलन (metabolic imbalance) की स्थिति में चला गया था।”
ब्लड शुगर का 550 mg/dL तक पहुँच जाना उनके शरीर को एक जानलेवा स्थिति की ओर धकेल चुका था। शरीर में पानी की कमी (dehydration), इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन और अंगों पर गंभीर दबाव पड़ने लगा था। इसके बाद एक शांत लेकिन खतरनाक स्थिति सामने आई—सेप्सिस, जिसमें इन्फेक्शन शरीर पर ही हमला करना शुरू कर देता है। डॉ. अंशुमन फूल ने कहा, “ऐसे मामलों में, हर घंटा बहुत अहम होता है। कभी-कभी तो कुछ मिनट ही यह तय करते हैं कि मरीज़ बचेगा या नहीं।”
ICU में ज़िंदगी की जंग
ICU एक ऐसी जगह बन गया था जहाँ हर एक सेकंड कीमती था। ऑक्सीजन सपोर्ट, IV इंसुलिन, एंटीबायोटिक्स, फ़्लूइड्स, इलेक्ट्रोलाइट्स को ठीक करना और लगातार निगरानी।
किसी भी चीज़ में ज़रा भी देरी नहीं की जा सकती थी। “शुरुआती घंटों में, हमारा पूरा ध्यान उनकी जान बचाने पर था। हमें सांस लेने में दिक्कत, इन्फेक्शन और मेटाबॉलिक असंतुलन इन सभी का एक साथ इलाज करना था,” डॉ. फूल ने कहा। परिवार ICU के बाहर चुपचाप इंतज़ार करता रहा। प्रार्थना, उम्मीद और विश्वास ही उनका एकमात्र सहारा थे।
फिर धीरे-धीरे उनमें जान लौटने लगी। तीसरे दिन, सुधार के पहले संकेत दिखाई दिए। ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होने लगा। इन्फेक्शन कम होने लगा। शरीर इलाज पर प्रतिक्रिया देने लगा और फिर सबसे बड़ी राहत मिली—भूर कौर को होश आ गया। डॉ. फूल ने कहा, “यह सचमुच राहत का पहला पल था। हमें पता चल गया था कि वह मौत के मुंह से वापस आ रहे हैं।” जो मरीज़ मौत के कगार पर था, वह धीरे-धीरे ज़िंदगी की ओर लौट रहा था।
‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’ ने पूरी स्थिति बदल दी
इस पूरी मेडिकल इमरजेंसी के दौरान, ‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’ ने बहुत अहम भूमिका निभाई। डॉक्टरों के मुताबिक, इस योजना की सबसे बड़ी बात यह थी कि इसने यह सुनिश्चित किया कि इलाज में कोई देरी न हो। डॉ. अंशुमान फूल ने कहा, “ऐसी इमरजेंसी स्थितियों में देरी किसी की जान ले सकती है। लेकिन मरीज़ इस योजना के तहत कवर था, इसलिए ICU और इमरजेंसी इलाज तुरंत शुरू हो गया।” कोई आर्थिक हिचकिचाहट नहीं। कोई इंतज़ार नहीं। सिर्फ़ तुरंत इलाज।
गंभीर मामलों में, यह तेज़ी कभी-कभी ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़र्क साबित हो सकती है।
अब धीरे-धीरे ठीक हो रहीं भूर कौर धीमी आवाज़ में बोलती हैं। वह अभी भी उस मुश्किल दौर की थकान से जूझ रही हैं, लेकिन मन ही मन बहुत शुक्रगुज़ार हैं। “मुझे सब कुछ याद नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि मेरी हालत बहुत गंभीर थी। मैं डॉक्टरों और सरकार की शुक्रगुज़ार हूँ। आज मैं इस हेल्थ कार्ड की वजह से ही ज़िंदा हूँ,” उन्होंने कहा। शब्द सीधे-सादे थे, लेकिन उनका अर्थ बहुत गहरा था।
एक ऐसा परिवार जिसने उम्मीद नहीं छोड़ी और एक ऐसा सिस्टम जिसने समय पर सहारा दिया। हरपाल और परमजीत के लिए, यह अनुभव ज़िंदगी भर याद रहेगा।
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