चंडीगढ़, 29 मई 2026: पंजाब में बदलते तापमान और गर्म गर्मियों के आने के साथ ही, मौसमी बीमारियों का प्रकोप एक बार फिर बढ़ने लगा है। सरकारी अस्पताल, जो पहले से ही रोज़मर्रा की बीमारियों से राहत पाने वाले मरीज़ों की भीड़ का सामना कर रहे हैं, अब बुखार से जुड़ी बीमारियों, सांस की बीमारियों और पेट से जुड़ी समस्याओं के मामलों में एक नई तेज़ी देख रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह मौसमी लहर हर साल एक चिंताजनक तरीके से लौटती है।
‘एक्यूट फेब्राइल इलनेस’ (तेज़ बुखार वाली बीमारी) कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें अचानक तेज़ बुखार आता है और इसमें कई तरह की बीमारियां शामिल हो सकती हैं। US Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के अनुसार, ऐसी स्थितियां वायरल, बैक्टीरियल या परजीवी संक्रमण के कारण हो सकती हैं। कभी-कभी मरीज़ बुखार को मुख्य लक्षण के तौर पर लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, जबकि संक्रमण का असली कारण शुरुआती चरण में साफ़ नहीं हो पाता।
पंजाब की ‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’ के ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले चार महीनों में कैशलेस इलाज के दावों की सबसे बड़ी श्रेणियों में ‘एक्यूट फेब्राइल इलनेस’ शामिल रही। राज्य की स्वास्थ्य एजेंसी से मिले आंकड़ों के अनुसार, ‘एक्यूट फेब्राइल इलनेस’ के 5,840 मामले दर्ज किए गए, जिन पर ₹1.31 करोड़ के दावों का भुगतान किया गया।
इसके अलावा, पानी से होने वाली और सांस की बीमारियों के मामले भी सामने आए। ‘एंटेरिक फीवर’ (आंतों के बुखार) के 1,396 मामले दर्ज किए गए, जिन पर ₹30.47 लाख के दावे किए गए। निमोनिया के 377 मामलों पर ₹11.06 लाख का खर्च आया, जबकि ‘एक्यूट ब्रोंकाइटिस’ के 326 मामलों पर ₹9.24 लाख का खर्च आया। वहीं, मॉनसून के दौरान अक्सर चर्चा में रहने वाली बीमारियों के मामले तुलनात्मक रूप से कम रहे। डेंगू के सिर्फ़ 12 मामले सामने आए, जिन पर ₹40,880 का दावा किया गया। मलेरिया के सिर्फ़ 3 मामले, चिकनगुनिया के 6 मामले और ‘हीट स्ट्रोक’ (लू लगने) के 4 मामले सामने आए।
हालांकि, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी भी तरह की लापरवाही न बरतने की सलाह दे रहे हैं। National Institute of Health के एक अध्ययन के अनुसार, बारिश, मच्छरों की बढ़ती संख्या और स्थानीय साफ़-सफ़ाई की स्थितियों के आधार पर मौसमी बीमारियों का प्रकोप तेज़ी से बदल सकता है।
पटियाला के सिविल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. विकास गोयल ने कहा कि यह स्थिति हर साल OPD में देखे जाने वाले सामान्य मौसमी दबाव को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि ज़्यादातर मामलों का इलाज प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर आसानी से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक गर्मी से तेज़ बुखार वाली बीमारियाँ, उल्टी, दस्त, सिरदर्द, साँस की बीमारियाँ और त्वचा व आँखों की एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं। गर्म मौसम के कारण लोग अक्सर इलाज में देरी कर देते हैं, जिससे गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।
डॉ. विकास गोयल ने कहा कि ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना’ मरीज़ों के लिए एक बड़ी राहत साबित हो रही है, क्योंकि इसके तहत वे अस्पताल में भर्ती होकर बिना किसी आर्थिक बोझ के कैशलेस इलाज करवा सकते हैं। उन्होंने कहा, “यह योजना यह सुनिश्चित करती है कि मरीज़ों को इलाज के लिए पहले से पैसे देने की चिंता किए बिना समय पर इलाज मिल सके। समय पर जाँच और इलाज से कई जानें बचाई जा सकती हैं।”
अत्यधिक गर्म और उमस भरे मौसम में बच्चे सबसे ज़्यादा जोखिम में होते हैं। फरीदकोट के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विभाग के प्रमुख डॉ. शशि कांत धीर ने चेतावनी दी कि नवजात शिशु और छोटे बच्चों को संक्रमण का खतरा ज़्यादा होता है। उन्होंने कहा कि कुपोषण, बार-बार उल्टी होना, तेज़ साँस लेना, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन), दौरे पड़ना और लगातार बुखार जैसे लक्षणों को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि तीन महीने से कम उम्र के किसी भी शिशु को बुखार होने पर उसे तुरंत एक मेडिकल इमरजेंसी माना जाना चाहिए।
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