लेखक होना खतरनाक खेल खेलने की तरह है : गीतांजली श्री

पंजाबी यूनिवर्सिटी में बुकर अवार्ड विजेता लेखिका गीतांजली श्री ने दिया ‘ प्रो. गुरदयाल सिंह यादगारी भाषण’

by TheUnmuteHindi
लेखक होना खतरनाक खेल खेलने की तरह है : गीतांजली श्री

लेखक होना खतरनाक खेल खेलने की तरह है : गीतांजली श्री
– पंजाबी यूनिवर्सिटी में बुकर अवार्ड विजेता लेखिका गीतांजली श्री ने दिया ‘ प्रो. गुरदयाल सिंह यादगारी भाषण’
पटियाला, 20 जनवरी : ‘ लेखक होना खतरनाक खेल खेलने की तरह है। लेखक को अपनी बात कहते हमेशा बेबाक होना चाहिए।’ यह विचार बुक्कर अवार्ड विजेता प्रसिद्ध हिंदी लेखिका गीतांजली श्री ने पंजाबी यूनिवर्सिटी की ‘ प्रो. गुरदयाल सिंह चेयर’ की तरफ से यूनिवर्सिटी में भाषाओं साथ सम्बन्धित विभागों के सहयोग के साथ करवाए गए ‘सालाना गुरदयाल सिंह यादगारी भाषण’ मौके प्रगट किए।
गीतांजली श्री ने कहा कि अच्छी लेखनी हमेशा ही सत्ता और अन्य स्थापित ताकतों के लिए संभावित खतरों के साथ भरी होती है क्योंकि लेखक हमेशा नई और मौलिक बात कहनी चाहता है। वह स्थापित घटनाक्रमों और धारणाओं को उधेड़ बुन कर नए सिरे से बनाने के लिए बजिद होता है। ऐसा होना स्थापति के रास नहीं आता। उन्होंने कहा कि अकसर लोक लेखकों को चुपचाप अपना काम करते हुए किसी भी विवाद में ना पडऩे की सलाह देते हैं, जबकि वाद विवाद वाले मुद्दों में दखल देना लेखक होने का असली धर्म है। निजी अनुभव के हवाले के साथ की एक और अहम टिप्पनी में उन्होंने कहा कि साहित्य लिखना इस लिए भी खतरनाक खेल है क्योंकि यह सिर्फ चेतन कोशिश का परिणाम ही नहीं होता बल्कि साहित्य निर्माण समय बहुत बार लेखक का अवचेतन भी आप ुमहारता के साथ इसमें शामिल होता है। उन्होंने कहा कि लेखक को अपने आस पास की चीजों से टूट कर विचरते हुए उनको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए बल्कि जमीनी स्तर पर उनके के साथ जुड़ कर सच व बेबाकी के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। उहोंने अपने विभिन्न अनुभवों तथा निजी किस्सों के हवाले के साथ बताया कि लेखक को समाज में किस तरह उसका बनता महत्व नहीं दिया जाता, जोकि चिंताजनक बात है। उन्होंने इसके कारणों की ओर इशारा करते हुए कहा कि लेखनी का असर व इस्तेमाल अन्य शह जैसे तुरंत व एकदम नहीं होता, जिस कारण आम लोगों में लेखक का वह महत्व नहीं, जोकि होना चाहिए था। धन्यवादी शब्द हिंदी विभाग के प्रमुख डा. नीतू कौंसिल की तरफ से किया गया। मंच- संचालन का कार्य डा. गुरसेवक लंबी ने किया।

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