नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2026। पीरियड्स का अनियमित होना, अचानक वजन बढ़ना, चेहरे पर मुंहासे निकलना, बाल झड़ना या हर समय थकान महसूस करना—इन लक्षणों को अक्सर महिलाएं हार्मोनल बदलाव समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। कई बार परिवार या आसपास के लोग भी इसे सामान्य समस्या बताकर टाल देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे लक्षणों के पीछे पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS), थायरॉइड की बीमारी या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जिनकी पहचान के लिए अलग-अलग जांच की जरूरत पड़ सकती है।
14 अक्टूबर को प्रकाशित Hindustan Times की एक रिपोर्ट में 45 वर्षों से अधिक अनुभव वाली गाइनकोलॉजिस्ट डॉ. मंजू सिन्हा ने इस बात पर जोर दिया कि हर समस्या को सामान्य ‘हॉर्मोनल इम्बैलेंस’ कह देना पर्याप्त नहीं है। सही कारण जानने के बाद ही इलाज तय किया जाना चाहिए।
आखिर ‘हॉर्मोनल इम्बैलेंस’ कहने से समस्या क्यों नहीं सुलझती?
हॉर्मोन शरीर में पीरियड्स, मेटाबॉलिज्म, प्रजनन क्षमता और कई दूसरे कार्यों को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं। इनके स्तर या कामकाज में बदलाव होने पर अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
समस्या यह है कि एक जैसे लक्षणों के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पीरियड्स अनियमित होने की वजह PCOS हो सकती है, लेकिन थायरॉइड की गड़बड़ी या अन्य स्थितियां भी ऐसा कर सकती हैं।
इसलिए केवल लक्षण देखकर किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। डॉक्टर को महिला की उम्र, मासिक धर्म का इतिहास, दवाओं, अन्य लक्षणों और जरूरत के अनुसार जांचों को ध्यान में रखना पड़ता है।
PCOS और थायरॉइड में क्या है अंतर?
PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम: यह एक हार्मोन और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी स्थिति है। इसके लक्षणों में अनियमित पीरियड्स, चेहरे या शरीर पर ज्यादा बाल आना, मुंहासे और कुछ महिलाओं में वजन से जुड़ी परेशानियां शामिल हो सकती हैं। हर महिला में इसके लक्षण एक जैसे नहीं होते।
थायरॉइड की समस्या: थायरॉइड ग्रंथि शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने वाले हॉर्मोन बनाती है। इसकी गतिविधि कम या ज्यादा होने पर थकान, वजन में बदलाव, ठंड या गर्मी के प्रति संवेदनशीलता और मासिक धर्म में गड़बड़ी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
इन दोनों स्थितियों के कुछ लक्षण मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसीलिए यह मान लेना गलत है कि अनियमित पीरियड्स या वजन बढ़ना अपने आप PCOS का प्रमाण है।
भारतीय महिलाओं में PCOS को लेकर क्या कहती है रिसर्च?
PCOS को लेकर भारत में किए गए अध्ययनों में इसकी व्यापकता के अनुमान अलग-अलग मिले हैं। 2026 में प्रकाशित Hindustan Times की रिपोर्ट में NIH के हवाले से किशोरियों में PCOS की व्यापकता के अनुमान लगभग 3 प्रतिशत से लेकर 18 प्रतिशत के करीब तक बताए गए हैं।
वहीं, AIIMS ऋषिकेश से जुड़े एक व्यवस्थित समीक्षा अध्ययन में 4,473 प्रतिभागियों के आंकड़ों के आधार पर व्यापकता का अनुमान 17.74 प्रतिशत दर्ज किया गया। हालांकि, अलग-अलग अध्ययनों में इस्तेमाल किए गए मानदंड, प्रतिभागियों की उम्र और अध्ययन की आबादी अलग हो सकती है। इसलिए इन आंकड़ों को हर भारतीय महिला पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
ये आंकड़े इस बात की जरूरत जरूर दिखाते हैं कि महिलाओं में लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को केवल तनाव, खानपान या सामान्य हार्मोनल बदलाव मानकर नहीं टालना चाहिए।
डॉक्टर किन जांचों की सलाह दे सकते हैं?
हर महिला को एक जैसी जांच कराने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर जांच तय करते हैं। इनमें शामिल हो सकते हैं:
- थायरॉइड टेस्ट: जरूरत के अनुसार TSH और अन्य संबंधित जांच।
- हार्मोन से जुड़ी जांच: लक्षणों के आधार पर कुछ खास हार्मोन के स्तर देखे जा सकते हैं।
- PCOS का मूल्यांकन: मासिक धर्म का इतिहास, शारीरिक लक्षण और जरूरत के अनुसार लैब टेस्ट या अल्ट्रासाउंड।
- अन्य कारणों की जांच: डॉक्टर जरूरत पड़ने पर दूसरी संभावित स्थितियों को भी देखते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि PCOS की पहचान के लिए हर महिला को अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी नहीं होता। इसी तरह, केवल एक हार्मोन टेस्ट के आधार पर सभी समस्याओं का कारण तय नहीं किया जा सकता।
महिलाओं को किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
यदि पीरियड्स लगातार अनियमित हो रहे हैं, कई महीनों तक नहीं आ रहे, चेहरे पर अचानक ज्यादा बाल आने लगे हैं, बाल तेजी से झड़ रहे हैं या वजन में अस्पष्ट बदलाव हो रहा है, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।
अत्यधिक रक्तस्राव, बेहोशी, तेज दर्द या गर्भावस्था की संभावना के साथ रक्तस्राव जैसी स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो सकती है।
लक्षणों का मतलब हमेशा गंभीर बीमारी नहीं होता, लेकिन उनका लगातार बने रहना जांच कराने का अच्छा कारण है।
इलाज हर महिला के लिए अलग क्यों हो सकता है?
PCOS और थायरॉइड की समस्याओं का इलाज एक जैसा नहीं होता। उपचार बीमारी के प्रकार, लक्षणों की गंभीरता, उम्र, दूसरी स्वास्थ्य स्थितियों और भविष्य में गर्भधारण की योजना जैसे पहलुओं पर निर्भर कर सकता है।
कुछ मामलों में दवाएं जरूरी होती हैं, जबकि खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद भी स्वास्थ्य प्रबंधन में मदद कर सकते हैं। हालांकि, केवल लाइफस्टाइल में बदलाव हर स्थिति का विकल्प नहीं है और डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए।
सबसे जरूरी बात: हर थकान, मुंहासे या अनियमित पीरियड्स का मतलब PCOS नहीं है। लेकिन हर लक्षण को ‘सिर्फ हार्मोनल इम्बैलेंस’ कहकर छोड़ देना भी सही नहीं। समय पर सही जांच और व्यक्तिगत इलाज महिलाओं को अनावश्यक चिंता और लंबे समय तक बनी रहने वाली परेशानी से बचाने में मदद कर सकते हैं।
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