नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026: भारतीयों की बदलती खानपान की आदतें सेहत पर किस तरह असर डाल सकती हैं, इसे लेकर एक नई रिसर्च सामने आई है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और चेन्नई के मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ खास जीन वाले लोगों में सफेद चावल और मैदे जैसे कम फाइबर वाले खाद्य पदार्थों का ज्यादा सेवन खून में कोलेस्ट्रॉल के ऊंचे स्तर से जुड़ा हो सकता है। यह अध्ययन 14 अक्टूबर को वैज्ञानिक पत्रिका PLOS One में प्रकाशित हुआ।
इस रिसर्च का अहम पहलू यह है कि सिर्फ खानपान ही नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के जीन भी शरीर पर खाने के असर को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सफेद चावल खाने वाले हर व्यक्ति को हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या होगी।
स्टडी में क्या सामने आया?
रिसर्च में वैज्ञानिकों ने भारतीय मूल के लोगों में खानपान और आनुवंशिक बनावट के बीच संबंध का अध्ययन किया। इसमें देखा गया कि कुछ खास जीन वाले लोगों में सफेद चावल और सफेद आटे जैसे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन, जबकि फल, सब्जियां और फाइबर कम लेना, खून में कोलेस्ट्रॉल के ज्यादा स्तर से जुड़ा था।
आसान भाषा में समझें तो एक ही तरह का खाना दो लोगों के शरीर पर बिल्कुल एक जैसा असर नहीं डाल सकता। उनकी आनुवंशिक बनावट, शारीरिक गतिविधि, उम्र, वजन और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां भी भूमिका निभा सकती हैं।
हालांकि, इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि सफेद चावल या मैदा सीधे हर व्यक्ति में कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। रिसर्च में मिले संबंध को समझने के लिए दूसरे अध्ययनों और अतिरिक्त वैज्ञानिक जांच की भी जरूरत हो सकती है।
सफेद चावल और मैदा ही क्यों चर्चा में हैं?
सफेद चावल और मैदा भारतीय खानपान का आम हिस्सा हैं। इन्हें बनाने की प्रक्रिया में साबुत अनाज की तुलना में फाइबर कम रह जाता है। दूसरी ओर, दालें, फल, सब्जियां और साबुत अनाज फाइबर के बेहतर स्रोत हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति की डाइट में चावल, मैदा या अन्य रिफाइंड अनाज की मात्रा बहुत ज्यादा है और फल-सब्जियां तथा फाइबर वाले खाद्य पदार्थ कम हैं, तो उसे अपनी पूरी डाइट पर ध्यान देने की जरूरत हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं कि भारतीयों को चावल खाना बंद कर देना चाहिए। मात्रा, खाने के साथ लिए जाने वाले दूसरे खाद्य पदार्थ और पूरी दिनचर्या भी मायने रखते हैं।
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर क्या परेशानी हो सकती है?
कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए जरूरी वसा जैसा पदार्थ है, लेकिन खून में LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर लंबे समय तक ज्यादा रहने पर धमनियों में वसा जमा होने का खतरा बढ़ सकता है। इससे आगे चलकर दिल की बीमारी और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है।
हाई कोलेस्ट्रॉल में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसलिए केवल शरीर में कोई परेशानी महसूस न होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि कोलेस्ट्रॉल सामान्य है। जरूरत के अनुसार डॉक्टर की सलाह से लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराया जा सकता है।
अपनी डाइट में क्या बदलाव कर सकते हैं?
इस रिसर्च से यह सीख मिलती है कि सिर्फ एक खाद्य पदार्थ को दोष देने के बजाय पूरे खानपान को संतुलित रखना जरूरी है। रोजमर्रा की डाइट में ये बदलाव मददगार हो सकते हैं:
- फल और सब्जियां बढ़ाएं: अलग-अलग रंगों के फल और सब्जियां खाने की कोशिश करें।
- फाइबर वाले खाद्य पदार्थ लें: दालें, चना, राजमा, ओट्स और साबुत अनाज को डाइट में शामिल करें।
- रिफाइंड अनाज की मात्रा पर ध्यान दें: सफेद चावल और मैदे से बनी चीजें खाएं, लेकिन इनके साथ फाइबर और प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ भी लें।
- शारीरिक गतिविधि बनाए रखें: नियमित चलना और व्यायाम दिल की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।
- जरूरत पड़ने पर जांच कराएं: परिवार में कम उम्र में दिल की बीमारी का इतिहास हो या कोलेस्ट्रॉल का जोखिम हो, तो डॉक्टर से सलाह लें।
क्या हर भारतीय को जीन टेस्ट करवाना चाहिए?
इस रिसर्च के आधार पर हर व्यक्ति के लिए जीन टेस्ट करवाना जरूरी नहीं कहा जा सकता। अध्ययन कुछ जीन और खानपान के बीच संबंध दिखाता है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि किस व्यक्ति को भविष्य में कोलेस्ट्रॉल की समस्या होगी।
कोलेस्ट्रॉल की जांच, व्यक्तिगत स्वास्थ्य इतिहास और डॉक्टर की सलाह अभी भी जोखिम समझने के महत्वपूर्ण तरीके हैं।
निष्कर्ष: भारतीय खानपान में चावल और मैदा आम हैं, लेकिन बेहतर स्वास्थ्य के लिए पूरी डाइट का संतुलित होना जरूरी है। नई स्टडी यह संकेत देती है कि कुछ लोगों में जीन और खानपान का मेल कोलेस्ट्रॉल के स्तर से जुड़ा हो सकता है। इसलिए बिना वजह चावल छोड़ने के बजाय फाइबर बढ़ाना, संतुलित भोजन करना और जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य जांच कराना अधिक व्यावहारिक कदम हैं।