चंडीगढ़, 22 अक्टूबर 2026: रत्तन ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स में पर्यावरण संरक्षण गतिविधि द्वारा पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन विषय पर जागरूकता सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को पर्यावरण से जुड़ी वर्तमान चुनौतियों के प्रति जागरूक करना तथा उन्हें प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित करना था।
सेमिनार के दौरान विद्यार्थियों को बताया गया कि आज बढ़ता प्रदूषण, जल संकट, प्लास्टिक कचरा, पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौतियां बन चुके हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रत्येक नागरिक, शैक्षणिक संस्थान और सामाजिक संगठन की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
जल संरक्षण: भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता
कार्यक्रम में जल संरक्षण के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। विद्यार्थियों को बताया गया कि जल जीवन का आधार है और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। भूजल स्तर में गिरावट, नदियों और तालाबों में बढ़ता प्रदूषण तथा पानी की बर्बादी आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं।
विद्यार्थियों को वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), घरों और संस्थानों में पानी की बर्बादी रोकने, रिसाव को तुरंत ठीक करवाने, जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने तथा वर्षा के पानी को जमीन में पुनर्भरण करने के उपायों के बारे में जागरूक किया गया। साथ ही, नदियों, तालाबों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों में कचरा, प्लास्टिक तथा रासायनिक अपशिष्ट न डालने की अपील की गई।
यह संदेश दिया गया कि जल संरक्षण केवल पानी बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जल स्रोतों की स्वच्छता, भूजल पुनर्भरण और जल चक्र को संतुलित बनाए रखना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कचरा प्रबंधन: स्वच्छ और टिकाऊ भविष्य की दिशा में कदम
सेमिनार में ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई। विद्यार्थियों को बताया गया कि अनियंत्रित कचरा न केवल शहरों और गांवों की स्वच्छता को प्रभावित करता है, बल्कि मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण का भी प्रमुख कारण बनता है। खुले में कचरा फेंकने और जलाने से पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विद्यार्थियों को कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग-अलग करने के लिए प्रेरित किया गया। गीले कचरे, सूखे कचरे और घरेलू खतरनाक कचरे को उचित तरीके से अलग रखना प्रभावी कचरा प्रबंधन की पहली सीढ़ी है। गीले जैविक कचरे से खाद (Composting) तैयार की जा सकती है, जबकि कागज, धातु, कांच और उपयुक्त प्लास्टिक जैसी पुनर्चक्रण योग्य वस्तुओं को अधिकृत रीसाइक्लिंग व्यवस्था तक पहुंचाया जा सकता है।
कार्यक्रम में Reduce, Reuse, Recycle और Recover (4R) के सिद्धांतों को अपनाने पर जोर दिया गया। विद्यार्थियों को सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करने, कपड़े या पुनः उपयोग योग्य थैलों को अपनाने, भोजन की बर्बादी रोकने तथा अनावश्यक वस्तुओं की खरीद से बचने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
इसके साथ ही, कचरे के वैज्ञानिक निपटान, ई-कचरे (E-waste) को अधिकृत संग्रह केंद्रों तक पहुंचाने और स्वच्छ सार्वजनिक स्थानों को बनाए रखने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया।
पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भूमिका
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को बताया गया कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन या किसी विशेष अभियान तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे दैनिक जीवन की आदत बनाना आवश्यक है। विद्यार्थी अपने घरों, कॉलेजों और समुदायों में जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, कचरा पृथक्करण और प्लास्टिक मुक्त वातावरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
वक्ताओं ने कहा कि पेड़-पौधे वायु की गुणवत्ता सुधारने, जैव विविधता को सुरक्षित रखने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसलिए वृक्षारोपण के साथ-साथ लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल और संरक्षण भी जरूरी है।
सेमिनार में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि स्वच्छ जल, स्वच्छ पर्यावरण और प्रभावी कचरा प्रबंधन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि कचरे का उचित निपटान नहीं किया जाता, तो वह नदियों, तालाबों और भूजल को प्रदूषित कर सकता है। इसी प्रकार, जल स्रोतों का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग सतत विकास के लिए आवश्यक है।