सहारनपुर, 23 अक्टूबर 2026: दिल्ली से देहरादून का सफर अब पहले की तुलना में काफी आसान और तेज़ हो गया है। इस साल 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 213 किलोमीटर लंबे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया। यह कॉरिडोर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उद्योग और व्यापार के लिए एक ‘गेम चेंजर’ साबित हो रहा है। लगभग ₹12,000 करोड़ की लागत से बना यह छह-लेन वाला, एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर यात्रा के समय को 6-7 घंटे से घटाकर 2.5 से 3 घंटे कर देता है। इससे उद्यमियों, निर्यातकों और ट्रांसपोर्टरों को समय बचाने और व्यावसायिक गतिविधियों को तेज़ करने में मदद मिली है।
इस कॉरिडोर की एक खास बात यह है कि इसका 135 किलोमीटर (लगभग 64%) हिस्सा यूपी से होकर गुजरता है। अक्षरधाम से शुरू होकर, यह लोनी, मंडोला, खेकड़ा, बड़ौत, शामली, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर से होते हुए देहरादून तक जाता है। सहारनपुर जिले में इसका सबसे लंबा हिस्सा (लगभग 45 किलोमीटर) है, जिससे विशेष रूप से इस जिले के व्यवसायों को लाभ मिलने की उम्मीद है। इस कॉरिडोर पर गति सीमा 100 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है। कथा, रसूलपुर खेड़ी, सैयद माजरा और गणेशपुर में चार बड़े टोल प्लाजा बनाए गए हैं। हर एंट्री और एग्जिट पॉइंट पर भी टोल लिया जाता है, लेकिन चूंकि यह एक ‘ग्रीनफील्ड’ कॉरिडोर है, इसलिए यात्रा के दौरान रुकावटें काफी कम हो जाती हैं।
सहारनपुर अपनी लकड़ी की नक्काशी, फर्नीचर और हस्तशिल्प उद्योगों के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। यहाँ बनने वाले उत्पादों को प्रमुख बाज़ारों तक पहुँचाने में परिवहन और माल की आवाजाही अहम भूमिका निभाती है। दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर के ज़रिए बेहतर सड़क संपर्क ने दिल्ली-एनसीआर के व्यावसायिक केंद्रों, निर्यात-व्यापार इकाइयों और अन्य बाज़ारों तक पहुँचना आसान बना दिया है। लकड़ी के फर्नीचर, सजावटी सामान और हस्तशिल्प उत्पादों का कारोबार करने वालों को तेज़ सप्लाई चेन से फ़ायदा मिल रहा है। इससे समय पर सामान पहुँचाने और ग्राहकों की ज़रूरतों के हिसाब से व्यापार करने की क्षमता बढ़ी है।
मुज़फ़्फ़रनगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है। यहाँ पेपर मिलें, स्टील और इंजीनियरिंग इकाइयाँ, चीनी मिलें और इनसे जुड़ी अन्य औद्योगिक गतिविधियाँ अहम भूमिका निभाती हैं। इन उद्योगों को कच्चे माल की नियमित आपूर्ति और तैयार उत्पादों के समय पर परिवहन की ज़रूरत होती है। पेपर उद्योग के लिए तैयार उत्पादों की सुरक्षित और समय पर डिलीवरी ज़रूरी है, जबकि स्टील और इंजीनियरिंग इकाइयों को भारी सामान के परिवहन की आवश्यकता होती है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे ने औद्योगिक इकाइयों को आपूर्तिकर्ताओं, वितरकों और ग्राहकों के साथ बेहतर तालमेल बिठाने में मदद की है। बेहतर सड़क संपर्क से सामान लाना-ले जाना आसान हो गया है, जिससे व्यावसायिक गतिविधियों में तेज़ी आने की संभावनाएँ बढ़ी हैं।
शामली ज़िले की अर्थव्यवस्था में कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों की अहम भूमिका है। बेहतर सड़क संपर्क चीनी मिलों, कृषि उपज के व्यापार, फ़ूड प्रोसेसिंग और अन्य स्थानीय औद्योगिक गतिविधियों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो रहा है। इस कॉरिडोर के ज़रिए कृषि उपज को प्रोसेसिंग इकाइयों तक पहुँचाना और तैयार उत्पादों को दिल्ली-एनसीआर तथा उत्तराखंड के बाज़ारों तक ले जाना आसान हो गया है। इससे कृषि-आधारित व्यवसायों से जुड़े लोगों के लिए बाज़ार तक पहुँच बेहतर हुई है।
बेहट क्षेत्र हस्तशिल्प, लकड़ी की नक्काशी और कृषि उपकरणों के निर्यात के लिए जाना जाता है। यहाँ के निर्यातकों को उम्मीद है कि दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर उनके व्यावसायिक कार्यों में तेज़ी लाएगा। इंडियन इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के बेहट संयोजक और ‘इंडियन विलेज हैंडीक्राफ्ट’ के मालिक हाजी रफ़ीक़ अहमद बताते हैं कि पहले सहारनपुर से दिल्ली के ICD तुग़लकाबाद तक एक कंटेनर पहुँचाने में आठ से दस घंटे लग जाते थे। NH-709B पर ट्रैफ़िक जाम और सिंगल-लेन सड़कों की वजह से अक्सर शिपमेंट में देरी हो जाती थी, जिसके कारण विदेशी खरीदार जुर्माना लगा देते थे।
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