प्रकृति को बचाने के लिए दुनिया के पास कम पड़ रहा पैसा, UN सम्मेलन में उठेगा बड़ा सवाल

by Priya

येरेवान (आर्मेनिया), 17 अक्टूबर 2026। जंगलों, समुद्रों और वन्यजीवों को बचाने के लिए दुनिया के देशों ने बड़े-बड़े लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन इन वादों को पूरा करने के लिए जरूरी पैसा जुटाने की रफ्तार काफी धीमी है। संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता सम्मेलन COP17 से पहले सामने आए आंकड़ों ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आर्मेनिया की राजधानी येरेवान में 19 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस सम्मेलन में करीब 200 देशों के प्रतिनिधि जैव विविधता बचाने के लिए किए गए वादों की समीक्षा करेंगे। बैठक 30 अक्टूबर तक चलेगी। इसमें सबसे अहम मुद्दा यह रहेगा कि प्रकृति को बचाने के लिए तय रकम कहां से आएगी और देश अपने लक्ष्यों को समय पर कैसे पूरा करेंगे।

2030 तक 30% जमीन और समुद्री क्षेत्र बचाने का लक्ष्य

साल 2022 में कनाडा के मॉन्ट्रियल में हुए समझौते के तहत देशों ने 2030 तक धरती के कम से कम 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षण देने का लक्ष्य रखा था। इसके साथ ही जैव विविधता की रक्षा के लिए हर साल 200 अरब डॉलर जुटाने का वादा भी किया गया था।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र की प्रगति रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा प्रयासों के आधार पर 2030 तक केवल 26 प्रतिशत भूमि और 12 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र को ही संरक्षण मिल पाने का अनुमान है। इसका मतलब है कि दुनिया अभी अपने तय लक्ष्य से काफी पीछे है।

200 अरब डॉलर के लक्ष्य के मुकाबले कितना पैसा जुटा?

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के आंकड़ों में 2023 से 2025 के बीच प्रकृति संरक्षण के लिए सालाना करीब 75 अरब से 92 अरब डॉलर जुटाए जाने का अनुमान है। यह 2030 तक तय 200 अरब डॉलर के सालाना लक्ष्य के आधे से भी कम है।

विकासशील देशों को आर्थिक सहायता देने का लक्ष्य भी महत्वपूर्ण है। देशों ने 2025 तक ऐसे देशों के लिए सालाना 20 अरब डॉलर जुटाने का संकल्प लिया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2024 में करीब 19 अरब डॉलर जुटाए गए थे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी आने से आगे की प्रगति को लेकर चिंता बनी हुई है।

जंगलों और वन्यजीवों पर बढ़ रहा दबाव

प्रकृति को नुकसान पहुंचने की वजहों में जंगलों की कटाई, बढ़ता निर्माण, अत्यधिक मछली पकड़ना, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। इन कारणों से कई प्रजातियों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। जंगलों में आग और लंबे समय तक सूखा पड़ने जैसी घटनाएं भी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र की 2019 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि दुनिया की करीब 10 लाख पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे में हैं। ऐसे में संरक्षण के लिए पर्याप्त पैसा और वैज्ञानिक योजना उपलब्ध कराना जरूरी माना जा रहा है।

सम्मेलन में विकासशील देशों की मदद पर भी रहेगा जोर

कई विकासशील देशों में जैव विविधता से भरपूर जंगल, नदियां और समुद्री क्षेत्र हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त बजट और तकनीकी संसाधन नहीं हैं। इन देशों को स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर भी खर्च करना पड़ता है।

सम्मेलन में सरकारों, निजी संस्थानों और दूसरे वित्तीय स्रोतों से ज्यादा निवेश जुटाने पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसके साथ ही उन सरकारी सब्सिडी की समीक्षा भी अहम होगी, जो मछली पालन, कृषि या अन्य गतिविधियों के जरिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

कुछ देशों ने दिखाई उम्मीद की राह

चुनौतियों के बावजूद कुछ सकारात्मक कदम भी सामने आए हैं। जैव विविधता समझौते से जुड़े देशों ने 5,000 से अधिक पहल की घोषणा की है। इसके अलावा, 17 देशों के एक समूह ने संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के लिए सहयोग बढ़ाने की पहल की है। नौ निजी संस्थाओं ने अगले पांच वर्षों में विलुप्ति के खतरे से जूझ रही प्रजातियों की मदद के लिए 50 करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना भी घोषित की है।

COP17 में अब दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि देश अपने पुराने वादों को पूरा करने के लिए कितनी ठोस वित्तीय योजना पेश करते हैं। लक्ष्य केवल नए समझौते करना नहीं, बल्कि जंगलों, समुद्रों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए जमीन पर प्रभावी कदम उठाना भी है।

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