प्रेग्नेंसी में Omega-3 की खुराक से समय से पहले डिलीवरी का खतरा घट सकता है? नई स्टडी में सामने आई अहम बात

by Priya

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2026। गर्भावस्था के दौरान पोषण का ध्यान रखना मां और बच्चे, दोनों की सेहत के लिए जरूरी है। अब एक नई रिसर्च में संकेत मिला है कि Omega-3 फैटी एसिड का एक प्रकार DHA कुछ महिलाओं में समय से पहले बच्चे के जन्म का जोखिम कम करने में मदद कर सकता है। खास बात यह है कि इसका संभावित फायदा महिलाओं के एक खास आनुवंशिक बदलाव से जुड़ा पाया गया है।

The Indian Express में 14 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में की गई इस स्टडी में उन गर्भवती महिलाओं के परिणामों का विश्लेषण किया गया, जिन्हें रोजाना DHA की अलग-अलग खुराक दी गई थी। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन नतीजों की पुष्टि के लिए भारत में अलग क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत है।

क्या होती है समय से पहले डिलीवरी?

आमतौर पर गर्भावस्था लगभग 40 सप्ताह की होती है। गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले बच्चे का जन्म होने को प्रीटर्म बर्थ यानी समय से पहले जन्म कहा जाता है।

ऐसे बच्चों को सांस लेने, शरीर का तापमान नियंत्रित करने और दूसरी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। 34 सप्ताह से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में कुछ गंभीर जटिलताओं का जोखिम और अधिक हो सकता है।

भारत में समय से पहले जन्म एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। इसी वजह से ऐसी रिसर्च पर ध्यान दिया जा रहा है, जो गर्भावस्था के दौरान जोखिम को कम करने के नए तरीके खोजने में मदद कर सके।

स्टडी में क्या सामने आया?

यह शोध मेडिकल जर्नल PLOS Medicine में प्रकाशित हुआ। इसमें अमेरिका की 761 गर्भवती महिलाओं के आनुवंशिक और गर्भावस्था संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

महिलाओं को रोजाना 200 मिलीग्राम या 1,000 मिलीग्राम DHA दिया गया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि एक खास आनुवंशिक बदलाव रखने वाली महिलाओं में DHA की अधिक खुराक लेने वाले समूह में 34 सप्ताह से पहले प्रसव की दर कम थी।

  •  200 मिलीग्राम DHA वाले समूह में: शुरुआती प्रीटर्म बर्थ की दर 4.3% थी।
  • 1,000 मिलीग्राम DHA वाले समूह में: यह दर 1.1% दर्ज की गई।

यानी इस विशेष समूह में शुरुआती प्रीटर्म बर्थ की दर में लगभग 75% की सापेक्ष कमी देखी गई। लेकिन यह नतीजा सभी गर्भवती महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता।

DHA शरीर में क्या काम करता है?

DHA यानी Docosahexaenoic Acid एक Omega-3 फैटी एसिड है। यह मस्तिष्क और आंखों के विकास में भूमिका निभाता है। यह कुछ मछलियों और फिश ऑयल में पाया जाता है तथा कुछ सप्लीमेंट्स में भी मौजूद होता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, शरीर में फैटी एसिड को संसाधित करने से जुड़े FADS जीन में एक खास बदलाव कुछ महिलाओं की DHA संबंधी जरूरतों को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण यह संभावना सामने आई कि कुछ महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान DHA की अधिक मात्रा से ज्यादा लाभ मिल सकता है।

हालांकि, इस जैविक संबंध को पूरी तरह समझने और सही खुराक तय करने के लिए और शोध की जरूरत है।

भारत के लिए यह रिसर्च क्यों महत्वपूर्ण है?

स्टडी में शामिल शोधकर्ताओं के अनुसार, दक्षिण एशियाई आबादी में संबंधित आनुवंशिक बदलाव अपेक्षाकृत आम हो सकता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय महिलाओं के लिए DHA की खुराक को उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार तय करना उपयोगी होगा।

लेकिन इस शोध में भारतीय महिलाओं को शामिल नहीं किया गया था। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत में गर्भवती महिलाओं को DHA की अधिक खुराक देने से समय से पहले जन्म के मामलों में उसी अनुपात में कमी आएगी।

यदि भारत में आगे किए जाने वाले परीक्षणों में भी ऐसे परिणाम सामने आते हैं, तो भविष्य में कुछ महिलाओं के लिए अधिक लक्षित पोषण संबंधी उपाय तैयार करने में मदद मिल सकती है।

क्या गर्भवती महिलाएं खुद से Omega-3 की खुराक बढ़ा दें?

नहीं। यह स्टडी अपने आप में सभी गर्भवती महिलाओं को DHA की अधिक खुराक लेने की सलाह देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

गर्भावस्था में सप्लीमेंट की जरूरत और खुराक महिला की सेहत, खानपान, मेडिकल हिस्ट्री और डॉक्टर की सलाह के आधार पर तय होनी चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के सप्लीमेंट की खुराक बढ़ाना उचित नहीं है।

स्टडी में यह भी संकेत मिला कि आनुवंशिक बदलाव न रखने वाली महिलाओं में अधिक DHA लेने का संबंध गर्भावस्था के 40 सप्ताह से आगे जारी रहने की अधिक संभावना से था। इसका अर्थ यह नहीं कि हर महिला को इससे नुकसान होगा, बल्कि यह बताता है कि खुराक का असर सभी में समान नहीं हो सकता।

आगे क्या होगा?

इस रिसर्च ने गर्भावस्था में पोषण और आनुवंशिक अंतर के बीच संभावित संबंध को सामने रखा है। अब भारत में परीक्षण यह समझने में मदद कर सकते हैं कि क्या इसी तरह के परिणाम भारतीय महिलाओं में भी दिखाई देते हैं।

फिलहाल सबसे जरूरी बात है कि गर्भावस्था में संतुलित आहार, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता दी जाए। नई रिसर्च उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन उसे स्थापित चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

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