चंडीगढ़, 20 अगस्त 2026: शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वैवाहिक विवाद में बच्चे का पैटरनिटी टेस्ट कराया जा सकता है। यह मामला तब सामने आया जब एक पति ने अपनी पत्नी के कथित अनैतिक चरित्र के आधार पर तलाक मांगा और दावा किया कि वह बच्चे का बायोलॉजिकल पिता नहीं है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने उस महिला की याचिका खारिज कर दी जिसने बच्चे के पैटरनिटी टेस्ट का विरोध किया था। महिला का तर्क था कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी भी पक्ष को DNA टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और उसके पति की तलाक की याचिका का फैसला पैटरनिटी टेस्ट के बिना ही किया जाना चाहिए।
बेंच ने पूछा, “अगर आप वफादार हैं तो आपको टेस्ट पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए?” कोर्ट ने पुणे की फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के उन आदेशों को बरकरार रखा जिनमें पति द्वारा शुरू की गई तलाक की कार्यवाही में DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था। पति का तर्क था कि अनैतिकता के आरोप को केवल DNA टेस्ट के जरिए ही साबित किया जा सकता है।
इस मामले में पति ने निजी तौर पर DNA टेस्ट कराया था जिसका नतीजा नेगेटिव आया जिससे पता चला कि वह बच्चे का बायोलॉजिकल पिता नहीं है।
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