नई दिल्ली, 10 अक्टूबर 2026: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में एक ही समय पर कई काम करने की आदत आम हो गई है। ऑफिस में ईमेल का जवाब देना, मोबाइल पर मैसेज देखना, मीटिंग में शामिल होना और साथ-साथ दूसरे काम निपटाना कई लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन लगातार एक काम से दूसरे काम पर जाने से हर बार काम जल्दी पूरा हो, यह जरूरी नहीं है। विशेषज्ञ इसे “टॉक्सिक मल्टीटास्किंग” के संदर्भ में समझाते हैं।
मनोवैज्ञानिक प्रेर्णा पंत के मुताबिक, बार-बार ध्यान बदलने से मानसिक थकान बढ़ सकती है और काम की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। जब कोई व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण काम के बीच बार-बार नोटिफिकेशन देखता है या दूसरे काम में लग जाता है, तो उसे पहले काम पर दोबारा ध्यान केंद्रित करने में समय लगता है। इसका असर एकाग्रता, याददाश्त और तनाव के स्तर पर भी पड़ सकता है।
मल्टीटास्किंग की समस्या यह है कि व्यक्ति को व्यस्त रहने का एहसास तो होता है, लेकिन जरूरी कामों को पूरा करने में अधिक समय लग सकता है। खासकर ऐसे काम जिनमें गहरी सोच, लेखन, विश्लेषण या निर्णय लेने की जरूरत होती है, उनमें लगातार व्यवधान परेशानी पैदा कर सकते हैं।
इस आदत को कम करने के लिए दिन की शुरुआत में दो या तीन सबसे जरूरी काम तय किए जा सकते हैं। काम करते समय गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखना, ईमेल देखने के लिए निश्चित समय तय करना और बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटना भी उपयोगी हो सकता है। बीच-बीच में छोटे ब्रेक लेने से भी ध्यान बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, हर तरह की मल्टीटास्किंग नुकसानदायक नहीं होती। कुछ साधारण काम साथ किए जा सकते हैं, लेकिन जब दो गतिविधियों को एक साथ करने से ध्यान, सुरक्षा या काम की गुणवत्ता प्रभावित हो, तब उन्हें अलग-अलग करना बेहतर होता है।
प्रोडक्टिविटी का अर्थ केवल अधिक काम करना नहीं, बल्कि जरूरी कामों को सही गुणवत्ता के साथ पूरा करना भी है। इसलिए लगातार व्यस्त रहने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी है कि दिन के अंत तक वास्तव में कितना जरूरी काम पूरा हुआ।
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