Bilal Saharanpuri: सहारनपुर एक ऐसा शहर है जहाँ मिट्टी की खुशबू में पुरानी कहानियाँ और नई कलाम मिलती हैं। इन्हीं कहानियों के बीच से उठती है एक पुरखुलूस आवाज़ बिलाल सहारनपुरी का। वे ऐसे शायर हैं जो अपनी ज़मीनी भाषा, व्यंग्य (तंज़), सामाजिक सरोकार और बेबाक अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं। आइए पढ़ते हैं उनसे हुई बातचीत के दिलचस्प सवाल-जवाब…
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सवाल: आपकी शायरी में गाँव की खुशबू, शहर का शोर और आम आदमी की चिंता साफ़ झलकती है। क्या यही आपकी पहचान है?
उत्तर (बिलाल सहारनपुरी): बिलकुल। मेरी शायरी ज़मीन से जुड़ी हुई है। मैं जो देखता हूँ, जो महसूस करता हूँ, वही लिखता हूँ। आज हालात ऐसे हैं कि हर तरफ़ नफ़रत फैली हुई है। ऐसे में मोहब्बत पर लिखना आसान नहीं होता। इसलिए कभी रोटी पर लिखना पड़ता है, कभी मज़दूरों की हालत पर।
“अभी लिखना पड़ेगा मुझको रोटी की ज़रूरत पर,
अभी लिखना पड़ेगा मुझको मज़दूरों की हालत पर।
अभी तो हर तरफ़ फैली हुई है नफ़रत ही नफ़रत,
मेरी जान, अभी मैं लिख नहीं सकता मोहब्बत पर।”
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सवाल: आपकी ग़ज़लों में राजनीति पर भी तीखा व्यंग्य दिखाई देता है। यह तेवर कहाँ से आता है?
बिलाल सहारनपुरी: देखिए, जब सियासत बदलती है तो किरदार भी बदल जाते हैं।
अकसर ऐसा होता है कि सत्ता मिलने के बाद इंसान अपनी फिक्र और फ़न खो देता है।
एक शेर है कि
“इस सियासत में मियां, आबाद होने के बाद,
मर गए किरदार ज़िंदाबाद होने के बाद।
हमसे अच्छा कौन सा शायर था, लेकिन जनाब,
फ़िक्र-ओ-फ़न जाता रहा उस्ताद होने के बाद।”
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सवाल: आपकी शायरी में आम आदमी, मज़दूर, रिक्शा चलाने वाला बार-बार आता है। क्यों?
बिलाल सहारनपुरी: क्योंकि असली हिंदुस्तान वहीं है। रिक्शा चलाने वाले ने बच्चों को पढ़ा दिया और जो नवाबज़ादे थे वो नज़ाकत में ही रह गए। जो लोग नदियों की हिफ़ाज़त करते हुए मर गए, आज वही पानी को तरस रहे हैं।
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सवाल: आपकी शुरुआती शायरी में मज़ाहिया (हास्य-व्यंग्य) ज़्यादा था, लेकिन अब रंग बदल गया है?
बिलाल सहारनपुरी: हाँ, वक़्त के साथ इंसान भी बदलता है। पहले मज़ाह में बहुत कुछ कह दिया जाता था, लेकिन अब हालात इतने संगीन हैं कि हँसी भी फीकी लगने लगी है।
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सवाल: आज के हालात में क्या शायर डरता नहीं?
बिलाल सहारनपुरी: डर तो होता है। आज ज़रा सा भी हुकूमत के ख़िलाफ़ बोलिए,
तो बुलडोज़र खड़ा मिल सकता है। लेकिन शायर को जेल भेज देने से क्या निकल जाएगा? उसकी आवाज़ तो फिर भी ज़िंदा रहती है।
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सवाल: पहले के नेताओं और आज के नेताओं में आप क्या फर्क देखते हैं?
बिलाल सहारनपुरी: पहले के नेताओं में सहनशीलता थी। मुलायम सिंह यादव जी का एक किस्सा सुनाता हूँ। सैफई में मुशायरा था। अदम गोंडवी ने समाजवादी सरकार के ख़िलाफ़ शेर पढ़ा। नेताजी खुद सामने बैठे थे। लोग घबरा गए, लेकिन नेताजी खड़े हुए और बोले—
“पढ़ो, पूरा पढ़ो।”
और शेर पढ़ा गया:
“पक्के समाजवादी हैं, तश्कर हों या डकैत,
कितना मज़ा है खादी के उजले लिबास में।”
और नेताजी खुश हुए, उन्होंने इनाम भी दिया।
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सवाल: आज जब आपके पास समय कम है, तो मोहब्बत आपके लिए क्या मायने रखती है?
बिलाल सहारनपुरी: मेरे पास इतना वक़्त नहीं है कि मैं महबूब की ज़ुल्फ़ें सँवारूँ।
और मैं इतना खूबसूरत भी नहीं हूँ कि कोई ख़्वाबों की महबूबा मिल जाए। मेरे लिए मोहब्बत आत्मा और परमात्मा का मिलन है। सिर्फ़ एक खूबसूरत चेहरे का नाम मोहब्बत नहीं।
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सवाल: तो क्या सिर्फ़ तरन्नुम से कोई शायर बन सकता है?
बिलाल सहारनपुरी: नहीं, तरन्नुम मदद करता है लेकिन असली ताक़त शब्दों में होती है।
शेर है कि,
“कुछ करम उस्ताद का था, कुछ तरन्नुम का कमाल,
माँकर ग़ज़लें यहाँ पर लोग शायर हो गए।”
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