पंजाबी और हिंदी साहित्य के महान ऋषि – डॉ. रतन सिंह जग्गी की अंतिम अरदास

by chahat sikri
पंजाबी और हिंदी साहित्य के महान ऋषि – डॉ. रतन सिंह जग्गी की अंतिम अरदास

 पटियाला, 1 जून 2025: डॉ. रतन सिंह जग्गी की अंतिम अरदास और पाठ का भोग 1 जून को पटियाला के गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा (फव्वारा चौक के पास) में दोपहर 12 से 1 बजे तक किया जाएगा।

साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान

डॉ. जग्गी, जो पंजाबी और हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित सिख विद्वान थे।  हाल ही में इस दुनिया से विदा हो गए। वह अपने साहित्यिक योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं और गुरमत एवं भक्तिकालीन साहित्य में उनका गहरा अध्ययन था। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, राष्ट्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, पंजाबी साहित्य शिरोमणि पुरस्कार, ज्ञान रत्न पुरस्कार और कई अन्य सम्मानों से नवाजा गया।

27 जुलाई 1927 को जन्मे डॉ. जग्गी ने छह दशकों तक मध्यकालीन साहित्य पर शोध किया। उन्होंने 1962 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से “दसम ग्रंथ का पौराणिक अध्ययन” विषय पर पीएच.डी. और 1973 में मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से हिंदी में “श्री गुरु नानक: व्यक्तित्व, कृतित्व और चिंतन” विषय पर डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की। 1987 में, वह पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के पंजाबी साहित्य अध्ययन विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

उनकी प्रमुख रचनाओं में “भाव प्रबोधिनी टीका – श्री गुरु ग्रंथ साहिब”, “सिख पंथ विश्वकोश”, “गुरु नानक बाणी: पाठ और व्याख्या”, “गुरु नानक की विचारधारा” और “तुलसी रामायण” का पंजाबी में अनुवाद शामिल है। उनके लेखन ने गुरमत विचारधारा को व्यापक स्तर पर प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

22 मई को 98 वर्ष की आयु में डॉ. जग्गी का निधन हुआ। उन्होंने अपने अंतिम समय तक साहित्य और शोध कार्यों को समर्पित रखा। वे अपने पीछे धर्मपत्नी डॉ. गुरशरण कौर जग्गी (सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज, पटियाला) और पुत्र मालविंदर सिंह जग्गी (सेवानिवृत्त आई.ए.एस.) को छोड़ गए हैं।

उनकी विद्वता और योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

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