Supreme Court on Gang Rape: एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामूहिक बलात्कार के मामले में यदि किसी एक व्यक्ति ने एक ही इरादे से अपराध किया है तो प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपराध के लिए दोषी माना जाएगा। अदालत ने सामूहिक बलात्कार के दोषियों की सजा बरकरार रखी। अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक आरोपी ने बलात्कार का कृत्य किया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(जी) के तहत सामूहिक बलात्कार के मामले में यदि सभी पक्षों ने एक ही इरादे से कार्य किया है, तो उनमें से प्रत्येक को कृत्य का दोषी ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के सजा को बरकरार रखा
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने पीड़िता का अपहरण किया। बाद में बंधक बनाया और उसके साथ बलात्कार किया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसने स्वयं कोई यौन कृत्य नहीं किया है, इसलिए उसे सामूहिक बलात्कार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हालाँकि, बाद में ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी पाया। उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अभियुक्त की याचिका खारिज कर दी और सजा बरकरार रखी।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विश्वनाथन ने अपने लिखित फैसले में कहा कि घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि पीड़िता का अपहरण, उसे गलत तरीके से बंधक बनाना और उसका यह बयान कि उसके साथ बलात्कार हुआ, ये सभी तथ्य धारा 376(2)(जी) के तहत उसके अपराध को साबित करते हैं।
क्या है ये पूरा मामला?
यह घटना जून 2004 में उस समय घटित हुई जब पीड़िता एक शादी समारोह से लौट रही थी। इसके बाद उनका अपहरण कर लिया गया और उन्हें कई स्थानों पर रखा गया। पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि जालंधर कोल और राजू नाम के दो व्यक्तियों ने उसके साथ बलात्कार किया। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को सामूहिक बलात्कार, अपहरण और अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने का दोषी ठहराया।
राजू को आजीवन कारावास और जालंधर कोल को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसे जालंधर कोयल ने स्वीकार कर लिया, लेकिन राजू नेसुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी।
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