तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 सवाल

by Manu
द्रौपदी मुर्मू

नई दिल्ली, 15 मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास वीटो पावर न होने की बात कही और राष्ट्रपति को भी अनुच्छेद 201 के तहत भेजे गए विधेयकों पर तीन महीने में फैसला लेने का निर्देश दिया। अगर विधानसभा दोबारा विधेयक पारित कर भेजती है, तो राज्यपाल को एक महीने में मंजूरी देनी होगी। इस फैसले ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा 10 विधेयकों को रोकने को गैरकानूनी ठहराया और उन्हें स्वीकृत मान लिया। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सवाल किया है।

इसके जवाब में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछकर औपचारिक राय मांगी। ये सवाल संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3), और 131 से जुड़े हैं। राष्ट्रपति ने इस फैसले को संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ और शक्तियों के अतिक्रमण के रूप में देखा। उनके

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे ये सवाल:

विधेयक आने पर राज्यपाल के पास क्या संवैधानिक विकल्प हैं?

क्या राज्यपाल इन विकल्पों का इस्तेमाल करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य हैं?

क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल का फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन है?

क्या अनुच्छेद 361 (राज्यपाल को कानूनी कार्रवाई से संरक्षण) उनके विधेयक संबंधी फैसलों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह रोकता है?

जब संविधान में समयसीमा का जिक्र नहीं है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय कर सकता है?

क्या राष्ट्रपति के विधेयक संबंधी फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं?

क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के फैसलों पर समयसीमा लागू कर सकता है?

क्या राष्ट्रपति के लिए सुप्रीम कोर्ट की सलाह (अनुच्छेद 143) मानना अनिवार्य है?

क्या विधानसभा द्वारा पारित विधेयक बिना राज्यपाल की मंजूरी के लागू हो सकता है?

क्या संवैधानिक व्याख्या के मामले पांच जजों की पीठ को भेजना जरूरी है (अनुच्छेद 145(3))?

क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय के लिए शक्तियां) का इस्तेमाल संविधान या कानूनों के खिलाफ निर्देश देने के लिए कर सकता है?

क्या केंद्र-राज्य विवादों को सुलझाने का अधिकार केवल अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट को है, या अन्य तरीकों से भी हो सकता है?

क्यों राज्य सरकारें केंद्र-राज्य विवादों में अनुच्छेद 131 के बजाय अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों की रक्षा) का सहारा ले रही हैं?

क्या लंबित विधेयकों को “स्वीकृत माना गया” मानना संवैधानिक है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा?

ये भी देखे: Pahalgam Attack Update: राष्ट्रपति मुर्मू से मिले गृह मंत्री अमित शाह, जयशंकर भी थे मौजूद

You may also like