Modi to visit RSS headquarters in Nagpur: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मार्च को नागपुर में आयोजित माधव नेत्रालय के भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल होंगे। यह नेत्रालय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इस दौरे को लेकर राजनीतिक हलकों में भी खास चर्चा है, क्योंकि यह हिंदू नववर्ष के पहले दिन हो रहा है। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद रहेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि वे रेशम बाग स्थित आरएसएस के मुख्यालय का भी दौरा कर सकते हैं। इसके अलावा, उनके दीक्षाभूमि जाने की भी संभावना जताई जा रही है। यह पहली बार होगा जब अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री मोदी और मोहन भागवत एक साथ एक मंच पर नजर आएंगे।
आरएसएस के दो प्रमुख स्थलों पर जा सकते हैं प्रधानमंत्री
सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी रेशम बाग स्थित हेडगेवार स्मृति भवन और दीक्षाभूमि का भी दौरा कर सकते हैं। हेडगेवार स्मृति भवन, आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार का समाधि स्थल है, जबकि दीक्षाभूमि वह स्थान है जहां डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। यदि प्रधानमंत्री मोदी इन दोनों स्थलों पर जाते हैं, तो इसे राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाएगा।
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत एक साथ एक मंच पर नजर आएंगे। इसे हिंदुत्व की विचारधारा को मजबूत करने और 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद की राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।
आरएसएस की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने की तैयारी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन हुई थी। अगले साल, यानी 27 सितंबर 2025 को संघ अपने 100 वर्ष पूरे करेगा। यह संगठन एक हिंदू राष्ट्रवादी और अर्धसैनिक संगठन के रूप में जाना जाता है, जिसका भारतीय राजनीति और विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी पर गहरा प्रभाव है। संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन भी है, जिसके करोड़ों स्वयंसेवक हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। आरएसएस और भाजपा के संबंधों को लेकर अक्सर चर्चाएं होती रहती हैं, और इस दौरे को भाजपा और संघ के बीच तालमेल को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके अलावा, दीक्षाभूमि की संभावित यात्रा से दलित समुदाय तक एक राजनीतिक संदेश भी भेजने की कोशिश हो सकती है।
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