नई दिल्ली, 14 जून 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 से 19 जून 2025 तक साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया की पांच दिवसीय यात्रा पर जाएंगे। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस यात्रा का मकसद भारत के प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ द्विपक्षीय और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। पीएम मोदी का ये दौरा क्रोएशिया में जाकर समाप्त होगा।
साइप्रस यात्रा (15-16 जून)
पीएम मोदी सबसे पहले साइप्रस जाएंगे, जहां वे राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस के निमंत्रण पर 15-16 जून को द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। यह दो दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली साइप्रस यात्रा होगी। नicosia में राष्ट्रपति के साथ बैठक और लिमासोल में बिजनेस लीडर्स को संबोधित करेंगे। यह यात्रा भारत-यूरोपीय संघ और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के साथ संबंधों को गहरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, खासकर क्योंकि साइप्रस 2026 की पहली छमाही में यूरोपीय संघ परिषद की अध्यक्षता संभालेगा। यह यात्रा भारत-पाकिस्तान तनाव और तुर्की के रुख को देखते हुए भी रणनीतिक रूप से अहम है, क्योंकि साइप्रस ने कश्मीर मुद्दे पर भारत का समर्थन किया है।
कनाडा यात्रा: G7 समिट में भाग लेंगे पीएम मोदी
साइप्रस के बाद, पीएम मोदी कनाडा के कनानास्किस में 16-17 जून को जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के निमंत्रण पर यह उनकी छठी लगातार जी-7 भागीदारी होगी। सम्मेलन में वे जी-7 देशों (फ्रांस, अमेरिका, यूके, जर्मनी, जापान, इटली, कनाडा) और अन्य आमंत्रित देशों के नेताओं के साथ ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, और AI-ऊर्जा जैसे वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। इस दौरान कुछ द्विपक्षीय बैठकें भी हो सकती हैं, हालांकि भारत-कनाडा संबंधों में खालिस्तानी मुद्दे के कारण तनाव को देखते हुए कोई औपचारिक द्विपक्षीय एजेंडा अभी घोषित नहीं हुआ है।
पहली बार क्रोएशिया का दौरा करेगा कोई भारतीय पीएम
यात्रा के आखिरी पड़ाव में, पीएम मोदी 18 जून को क्रोएशिया जाएंगे, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा होगी। क्रोएशिया के प्रधानमंत्री आंद्रेज प्लेंकोविक के निमंत्रण पर वे उनके और राष्ट्रपति जोरान मिलनोविच के साथ बैठक करेंगे। यह यात्रा भारत-क्रोएशिया संबंधों में ऐतिहासिक होगी, जो यूरोपीय संघ के साथ भारत के रिश्तों और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) में क्रोएशिया की संभावित भागीदारी को मजबूत करेगी। क्रोएशिया में इंडोलॉजी की समृद्ध परंपरा और रक्षा-तकनीकी सहयोग भी इस यात्रा का आधार हैं।
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