एमपी सतनाम सिंह संधू ने संसद में बजट इजलास दौरान भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को सुरक्षित रखने का उठाया मुद्दा

एमपी सतनाम सिंह संधू ने लुप्त होने के किनारे स्थित क्षेत्रीय भाषाओं को संभालने की मांग की; 19500 राष्ट्रीय भाषाओं का बनाया जाए शब्दकोष

by TheUnmuteHindi
एमपी सतनाम सिंह संधू ने संसद में बजट इजलास दौरान भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को सुरक्षित रखने का उठाया मुद्दा

एमपी सतनाम सिंह संधू ने संसद में बजट इजलास दौरान भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को सुरक्षित रखने का उठाया मुद्दा
एमपी सतनाम सिंह संधू ने लुप्त होने के किनारे स्थित क्षेत्रीय भाषाओं को संभालने की मांग की; 19500 राष्ट्रीय भाषाओं का बनाया जाए शब्दकोष
चंडीगढ़, 4 फरवरी : संसद मैंबर (राज्य सभा) सतनाम सिंह संधू ने आज संसद में भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को सुरक्षित रखने का मुद्दा उठाया, जो कि लुप्त होने के किनारे पर हैं। संसद में चल रहे बजट इजलास दौरान यह मुद्दा उठाते एमपी संधू ने कहा, भारत एक ऐसा देश था जहां अलग- अलग क्षेत्रों के लोगों द्वारा 120 से अधिक विभिन्न भाशाएं और 270 मातृ भाषाओं का अभ्यास किया जाता था। इसके अलावा 19, 500 क्षेत्रीय बोलियां थी, जिन का प्रयोग लोक, संचार के लिए करते थे। परन्तु हिंदी, पंजाबी, तामिल, बंगाली जैसी प्रमुख भारतीय भाषाओंं के मानकीकरन के कारण, ज़्यादातर क्षेत्रीय बोलियों और मातृ भाषााएं आज लुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं।
पंजाब की क्षेत्रीय भाषाओं की विरासत का उदाहरण देते एमपी संधू ने कहा, पंजाब में किसी समय 28 अलग- अलग क्षेत्रीय बोलियां थी, जिन का अभ्यास अलग- अलग भाईचारे द्वारा किया जाता था परन्तु आज पंजाब में प्रचलित क्षेत्रीय बोलियां कम करके सिर्फ 4 रह गई हैं जो कि माझी, मलवई से संबंधित, दोआबी और पुआधी हैं। इन क्षेत्रीय बोलियों में क्षेत्रीय विरासत और सभ्याचार का अच्छा प्रतिबिंब था। इस लिए यह समय की जरूरत है कि सरकारी यत्नों के द्वारा क्षेत्रीय बोलियों की संभाल के लिए काम किया जाए, नहीं तो हम अपनी भाषाई विरासत गंवा देंगे जो कि इन भाषाओं में लिखे साहित्य के रूप में है।
एमपी संधू ने सरकार से मांग की कि भारतीय भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों के शब्दकोष के प्रकाशन, भारतीय क्षेत्रीय बोलियां और उपभाषाओं में लिखे साहित्य के डिजीटाईजेशन पर काम शुरू किया जाए, जो कि लुप्त होने के खतरे में हैं। उन्होंने आगे यह भी कहा कि प्राथमिक शिक्षा में क्षेत्रीय बोलियों का प्रयोग के प्रबंध को उत्साहित किया जाये।
संसद मैंबर सतनाम सिंह संधू ने प्रधान मंत्री नरिन्दर मोदी के भारत की भाषायी विरासत की महत्ता को पहचानने और नयी शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग को उत्साहित करने के यत्न की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह पहली बार है कि एसटीईऐम विषयों और तकनीकी शिक्षा के अध्यापन में क्षेत्रीय भारतीय भाषाओंं में पढ़ाने के अभ्यास को प्राथमिकता दी गई है जो विद्यार्थियों को बेहतर ढंग के साथ सीखने में मदद करता है और यह यकीनी बनाता है कि भाषायी विरासत को बरकरार रखा जाये, क्योंकि विद्यार्थी उस भाषा में संकल्पों को और ज्यादा आसानी के साथ समझ सकते हैं जिस से वह अवगत हैं।
एमपी संधू ने सिंगापुर और फिलीपीनज जैसे देशों में प्रचलित शिक्षा माडल की उदाहरण दी जहां मातृ भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को लाजिमी करने के साथ विद्यार्थी भाईचारे की सीखने की शक्ति और योग्यता को बढ़ाने में सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा, इस माडल ने बौद्धिक अपंगता वाले बच्चों को पढ़ाने में भी मिसाली नतीजे दिखाए हैं।
अपने भाषण में आगे संसद मैंबर संधू ने नयी शिक्षा नीति के इंकलाबी और परिवर्तनशील प्रभाव को स्वीकार करते हुए शुरुआत की, जो कम से कम 5वीं कक्षा तक और तरजीही तौर पर 8वीं कक्षा तक शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग को लाजिमी बनाता है। उन्होंने स्भानीय भाषाओंं का प्रयोग को उत्साहित करने के लिए नीति की प्रशंसा की, खास कर एसटीईएम शिक्षा में, और कहा कि 10 राज्यों में 19 संस्थाएं पहले ही क्षेत्रीय भाषाओं में कोर्स शुरू कर चुके हैं, जिसकी उन्हों ने एक सकारात्मक कदम के तौर पर प्रशंसा की।

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