नई दिल्ली, 08 मार्च: चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की सटीकता को सुधारने और डुप्लिकेट मतदाता पहचान पत्र (ईपीआईसी) की समस्या को हल करने के लिए तीन महीने की समय सीमा तय की है। आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर मतदाता के पास केवल एक वैध और अद्वितीय पहचान पत्र हो, ताकि चुनावी प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी न हो।
ईपीआईसी प्रणाली में विसंगतियाँ: 2000 से चला आ रहा मुद्दा
यह समस्या 2000 में शुरू हुई थी, जब भारत में मतदाता पहचान पत्र (ईपीआईसी) प्रणाली लागू की गई थी। कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव पंजीकरण अधिकारियों ने सही क्रम का पालन नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप डुप्लिकेट पहचान पत्र जारी हो गए। चुनाव आयोग की जांच में यह पाया गया कि इन डुप्लिकेट पहचान पत्रों वाले मतदाता वैध थे, लेकिन इससे मतदाता सूची में विसंगतियाँ उत्पन्न हो रही थीं।
नए अद्वितीय पहचान पत्र का वितरण: सुधार की दिशा में कदम
चुनाव आयोग ने इस समस्या को हल करने के लिए डुप्लिकेट पहचान पत्रों की जगह हर मतदाता को एक अद्वितीय राष्ट्रीय ईपीआईसी नंबर देने का फैसला लिया है। साथ ही, नए मतदाताओं को भी विशिष्ट पहचान नंबर मिलेगा, जिससे भविष्य में किसी प्रकार की गलती से बचा जा सके। यह सुधार प्रक्रिया तीन महीने में पूरी की जाएगी, ताकि मतदाता सूची में और अधिक पारदर्शिता और सटीकता लाई जा सके।
समावेशी प्रक्रिया: मतदाता सूची का निरंतर सुधार
भारत में 99 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं, और चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का निरंतर अद्यतन किया जाता है। चुनाव आयोग की देखरेख में यह प्रक्रिया जिला चुनाव अधिकारियों और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा की जाती है, जिसमें राजनीतिक दलों और आम नागरिकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होती है।
वार्षिक विशेष सारांश संशोधन (SSR): हर साल का महत्वपूर्ण अपडेट
हर साल अक्टूबर से दिसंबर तक वार्षिक विशेष सारांश संशोधन (SSR) प्रक्रिया होती है, और जनवरी में मतदाता सूची का अंतिम संस्करण प्रकाशित किया जाता है। चुनावी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनावों से पहले एक अतिरिक्त संशोधन भी किया जाता है, ताकि सूची में और सुधार किया जा सके।
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