Simla Agreement News: शिमला समझौता (Simla Agreement) 28 जून से 2 जुलाई 1972 तक हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में आयोजित कई वार्ताओं का परिणाम था। इस पर भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता 1971 के युद्ध के बाद तनाव कम करने और दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। युद्ध में भारत ने न केवल पाकिस्तान को सैन्य रूप से पराजित किया बल्कि पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) को भी आजाद कराया और पाकिस्तान को दो भागों में विभाजित कर दिया।
इस समझौते का उद्देश्य बल प्रयोग के बिना आपसी विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना है तथा मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से किया जाएगा। युद्ध में कब्जाए गए क्षेत्रों की वापसी | इसमें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के कैदियों की रिहाई भी शामिल है। दोनों देश 1949 में खींची गई युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा (एल.ओ.सी.) के नए नाम से स्वीकार करेंगे।

शिमला समझौते के बाद क्या बदला
शिमला समझौता कश्मीर मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मंचों से हटाकर द्विपक्षीय स्तर पर लाने में भारत की महत्वपूर्ण सफलता थी। इसके साथ ही भारत ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी तीसरा पक्ष, जैसे संयुक्त राष्ट्र या कोई अन्य देश, कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
इस समझौते ने तत्काल सैन्य तनाव को कम करने और दक्षिण एशिया में स्थिरता को बढ़ावा देने में योगदान दिया। युद्ध विराम व्यवस्था और नियंत्रण रेखा की स्थापना से अनियोजित सैन्य वृद्धि रुक गई। 1971 के युद्ध और शिमला समझौते ने भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया। पाकिस्तान ने अपने युद्धबंदियों और क्षेत्रों को वापस तो हासिल कर लिया, लेकिन वह कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में असफल रहा।
शिमला समझौता (Simla Agreement) रद्द होता है तो भारत या पाकिस्तान किसको होगा फायदा?
अगर पाकिस्तान शिमला समझौते को रद्द करता है तो इसका फायदा भारत को ही होगा। यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान के लिए इसके परिणाम बहुत बुरे होंगे।
शिमला समझौता कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बनाये रखने का आधार है। यदि पाकिस्तान इसे रद्द कर देता है, तो भारत यह तर्क दे सकता है कि पाकिस्तान ने स्वयं ही इस समझौते को अमान्य कर दिया है, जिससे भारत को कश्मीर पर अपनी नीतियों को और अधिक मजबूत करने की स्वतंत्रता मिल जाएगी। भारत यह दावा कर सकता है कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है और हम बिना किसी बाहरी दबाव के इस पर निर्णय ले सकते हैं।
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